ABK24NEWS
● वरिष्ठ अधिवक्ता शरद पाठक की दलील बनी वादी की जीत की बड़ी वजह ।
● वादी अशोक कुमार पाण्डेय की याचिका स्वीकार, सरकार को लाभ वापस लेने, वसूली करने और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई के निर्देश ।
लखनऊ । इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने उत्तर प्रदेश के माध्यमिक शिक्षा विभाग से जुड़े एक अत्यंत महत्वपूर्ण सेवा विवाद में बड़ा फैसला सुनाते हुए स्पष्ट कर दिया है कि एडहॉक सेवा को वरिष्ठता, चयन वेतनमान, वार्षिक वेतनबृद्धि, वेतन संरक्षण तथा अन्य वित्तीय लाभों का आधार नहीं बनाया जा सकता । न्यायालय ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय के संजय सिंह एवं अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य के निर्णय के अनुसार एडहॉक सेवा की गणना केवल पेंशन एवं सेवानिवृत्ति लाभ के लिए ही की जा सकती है ।
यह फैसला अशोक कुमार पाण्डेय बनाम अन्य में 24 जुलाई 2026 को न्यायमूर्ति राजीव सिंह ने सुनाया । न्यायालय ने विवादित आदेशों को रद्द करते हुए सरकार को वरिष्ठता और वित्तीय लाभ वापस लेने, गलत भुगतान की वसूली करने तथा जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करने के निर्देश दिए हैं।

वरिष्ठ अधिवक्ता शरद पाठक की दलीलों को मिली न्यायालय की स्वीकृति
मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता अशोक कुमार पाण्डेय की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता शरद पाठक ने प्रभावी पैरवी करते हुए न्यायालय के समक्ष यह प्रमुख तर्क रखा कि सर्वोच्च न्यायालय के संजय सिंह एवं अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के निर्णय के पैरा 7(h) की गलत व्याख्या कर राज्य सरकार ने निजी प्रतिवादी को अवैध रूप से वरिष्ठता, चयन वेतनमान, वेतनवृद्धि और अन्य वित्तीय लाभ प्रदान कर दिए । उन्होंने न्यायालय को बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने एडहॉक सेवा को केवल पेंशन एवं सेवानिवृत्ति लाभ के लिए मान्य किया था, न कि वरिष्ठता या अन्य आर्थिक लाभों के लिए ।
◆ क्या था पूरा मामला-
याचिकाकर्ता अशोक कुमार पाण्डेय श्री लल्लन जी ब्रह्मचारी इंटर कॉलेज, भरतपुर, अम्बेडकर नगर में सहायक अध्यापक हैं । उनकी प्रारंभिक नियुक्ति 26 फरवरी 1999 को एडहॉक आधार पर हुई थी । बाद में उनकी सेवाओं का नियमितीकरण उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन बोर्ड अधिनियम, 1982 की धारा 33G के अंतर्गत 22 मार्च 2016 से प्रभावी माना गया और इसका आदेश 06 अक्टूबर 2022 को पारित हुआ ।
दूसरी ओर, निजी प्रतिवादी की प्रारंभिक नियुक्ति 2009 में एडहॉक आधार पर हुई थी । उसने सर्वोच्च न्यायालय के संजय सिंह निर्णय के बाद आयोजित चयन बोर्ड की परीक्षा उत्तीर्ण की और उसकी 16 अप्रैल 2022 को नियमित नियुक्ति हुई ।
विवाद तब उत्पन्न हुआ जब सरकार ने प्रतिवादी की 2009 से एडहॉक सेवा जोड़कर उसे वरिष्ठता, चयन वेतनमान, वेतनवृद्धि और अन्य वित्तीय लाभ प्रदान कर दिए । इससे उसे अशोक कुमार पाण्डेय से ऊपर वरिष्ठता सूची में स्थान मिल गया ।
◆ प्रतिवादी ने उठाई थी प्रारंभिक आपत्ति-
मामले की सुनवाई के दौरान प्रतिवादी की ओर से यह आपत्ति उठाई गई कि याचिकाकर्ता के नियमितीकरण का मामला स्वयं विवादित है, इसलिए उन्हें यह याचिका दायर करने का अधिकार नहीं है । हाईकोर्ट ने यह आपत्ति खारिज करते हुए कहा कि यदि किसी व्यक्ति को अवैध रूप से वरिष्ठता और वित्तीय लाभ दिए गए हैं और उससे याचिकाकर्ता की वरिष्ठता प्रभावित हुई है, तो याचिकाकर्ता को न्यायालय आने का पूरा अधिकार है ।
◆ सुप्रीम कोर्ट के पैरा 7(h) की निर्णायक व्याख्या-
हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय के 26 अगस्त 2020 के निर्णय का विस्तार से उल्लेख किया । सुप्रीम कोर्ट ने उस समय एडहॉक शिक्षकों के लिए एक विशेष चयन प्रक्रिया निर्धारित की थी, जिसमें उन्हें परीक्षा में बैठने का अवसर, पूर्व सेवा का वेटेज, तथा चयन के बाद नियमित नियुक्ति का प्रावधान दिया गया था । लेकिन पैरा 7(h) में स्पष्ट रूप से कहा गया था कि एडहॉक सेवा की सत्यापित अवधि को केवल सेवानिवृत्ति लाभ के लिए गिना जाएगा । हाईकोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार ने इस प्रावधान का गलत अर्थ लगाकर एडहॉक सेवा को सभी सेवा लाभों का आधार मान लिया, जबकि सर्वोच्च न्यायालय ने ऐसा कोई निर्देश नहीं दिया था ।
● सरकारी पत्र गलत पाया गया–
मामले में यह तथ्य सामने आया कि राज्य सरकार ने 01 मई 2024 को एक सरकारी पत्र जारी किया था, जिसमें धर्मेन्द्र सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले के आधार पर एडहॉक सेवा को चयन वेतनमान, वरिष्ठता और अन्य लाभों के लिए मान्य माना गया । हाईकोर्ट ने कहा कि यह सरकारी पत्र सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के विपरीत है और सरकार किसी सरकारी आदेश के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का विस्तार नहीं कर सकती ।
● सरकार ने भी मानी अपनी गलती-
सुनवाई के दौरान अपर मुख्य सचिव, माध्यमिक शिक्षा द्वारा दाखिल व्यक्तिगत हलफनामे में स्वीकार किया गया कि 01 मई 2024 का सरकारी पत्र त्रुटिपूर्ण था । हलफनामे में कहा गया कि उक्त पत्र सुप्रीम कोर्ट के निर्णय की गलत व्याख्या के आधार पर जारी हुआ और इसे निरस्त कर आवश्यक सुधारात्मक कार्रवाई की जाएगी । न्यायालय ने इस स्वीकारोक्ति को महत्वपूर्ण माना और कहा कि स्वयं सरकार यह मान रही है कि प्रतिवादी को दिया गया लाभ कानून के अनुरूप नहीं था ।
● शासनादेश पर भी टिप्पणी
सरकार ने अपने पक्ष में 08 मार्च 1995 के शासनादेश का भी उल्लेख किया था । हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड देखने के बाद कहा कि यह शासनादेश उन शिक्षकों पर लागू होता है जिनका लंबे समय की संतोषजनक सेवा के आधार पर नियमितीकरण हुआ है । इसका संबंध उन शिक्षकों से नहीं है जिनकी नियमित नियुक्ति चयन बोर्ड की परीक्षा के बाद हुई है । इसलिए इस शासनादेश का सहारा लेकर प्रतिवादी को लाभ देना उचित नहीं था ।
● मुख्य आदेश : वरिष्ठता वापस लो, वसूली करो-
हाईकोर्ट ने अपने अंतिम आदेश में कहा कि प्रतिवादी को एडहॉक सेवा के आधार पर दी गई वरिष्ठता और अन्य वित्तीय लाभ तत्काल प्रभाव से वापस लिए जाएँ । न्यायालय ने सरकार को निर्देश दिया कि वरिष्ठता सूची संशोधित की जाए, चयन वेतनमान और अन्य आर्थिक लाभ समाप्त किए जाएँ, गलत रूप से किए गए भुगतान की वसूली की जाए, जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए, और आवश्यक होने पर विजिलेंस जांच भी कराई जाए । कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय उत्तर प्रदेश के माध्यमिक शिक्षा विभाग में कार्यरत उन हजारों शिक्षकों को प्रभावित कर सकता है, जिन्हें एडहॉक सेवा जोड़कर वरिष्ठता, चयन वेतनमान, वेतन संरक्षण, वेतनवृद्धि या अन्य वित्तीय लाभ प्रदान किए गए हैं । यदि सरकार इस निर्णय के अनुपालन में व्यापक स्तर पर कार्रवाई करती है, तो अनेक वरिष्ठता सूचियों का पुनरीक्षण, वित्तीय लाभों की समीक्षा और गलत भुगतान की वसूली की प्रक्रिया शुरू हो सकती है ।







